मराठा आरक्षण आंदोलन का समाधान आसान नहीं ........ लगातार दूसरे साल महाराष्ट्र को झकझोरने वाले मराठा आरक्षण आंदोलन का कोई फौरी समाधान नहीं |
  • Ashutosh
  • 29-07-2018
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Ashutosh
29-07-2018 10:48 PM

लगातार दूसरे साल महाराष्ट्र को झकझोरने वाले मराठा आरक्षण आंदोलन का कोई फौरी समाधान नहीं है। उम्मीद यही की जा सकती है कि वह खुद थककर शांत हो जाए या फिर यह आशंका भी है कि वह हिंसक होकर गुजरात के पाटीदारों और हरियाणा के जाटों को नए तरीके से भड़का दे। इस आंदोलन की एक बड़ी वजह राज्य के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस का ब्राह्मण समुदाय से होना भी है। इसीलिए मराठा क्रांति मोर्चा मुख्यमंत्री से निजी टकराव भी लेने में लगा हुआ है।

 

पहले मुख्यमंत्री की पंढरपुर की धार्मिक यात्रा में रुकावट डालकर उसे रद्‌द करवा दिया गया और अब कहा जा रहा है कि जब तक मुख्यमंत्री अपने बयान के लिए माफी नहीं मांगेंगे तब तक आंदोलन शांत नहीं होगा। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया था कि कुछ आंदोलनकारी नेता हिंसा की योजना बना रहे हैं। उधर मनसे के नेता राज ठाकरे ने मुख्यमंत्री के आश्वासनों को झूठा बताया है। उनका कहना है कि जब नौकरियां हैं ही नहीं तो वे कैसे कह सकते हैं कि अगर बॉम्बे हाई कोर्ट अनुमति देगा तो राज्य के 72,000 खाली पदों में 16 प्रतिशत मराठों को मिलेंगे। यथार्थ है कि राज्य सिर्फ दो प्रतिशत नौकरियां सृजित कर पा रहा है। राज्य सरकार ने तो पहले अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर ही मराठों को 16 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर दी थी लेकिन, बॉम्बे हाई कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी। रोक का आधार उसी तरह का है जैसा जाटों और पाटीदारों के मामले में है।

 

मराठा समुदाय की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति के बारे में किसी सरकारी आयोग का नया ताजा सर्वेक्षण उपलब्ध नहीं है। कुछ स्वतंत्र अध्येताओं की रिपोर्ट के मुताबिक यह मिथक है कि वे राज्य की सर्वाधिक संपन्न और आगे बढ़ी हुई जातियों में शुमार है। 2007 का एक सर्वेक्षण बताता है कि उनमें 40 प्रतिशत परिवार राज्य की गरीबी रेखा से नीचे निवास करते हैं। इसके ठीक उलट इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में प्रकाशित 2017 का एक अध्ययन यह बताता है कि गांवों में उनकी आबादी 38 प्रतिशत है लेकिन, उनके कब्जे में ग्राम प्रधानी के 63 प्रतिशत पद हैं। फिर भी अगर उनमें ऐसा असंतोष है तो इसकी वजह अर्थव्यवस्था में गांवों का घटता महत्व और शिक्षा और पूंजी पर टिके शहरी जीवन का बढ़ता महत्व है। अगर बाजार और सरकार इस असंतुलन को दूर नहीं कर सकते तो इस तरह के अन्य आंदोलनों का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ेगा।

 

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